भारतीय आविष्कारक



सर चंद्रशेखर वेंकट रामन ( 1888-1970 ) एक भारतीय भौतिकशास्त्री थे , जो पूर्ववर्ती मद्रास प्रांत में पैदा हुए थे, जिन्हें वर्तमान में तमिलनाडु के नाम से जाना जाता है । उन्हें प्रकाश के प्रकीर्णन पर भौतिकी में उनके कार्य के लिए 1930 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया । उन्होंने खोजा कि जब प्रकाश किसी पारदर्शी सामग्री में अनुप्रस्थ गति करता है , तो कुछ विचलित प्रकाश तरंग - आयाम में परिवर्तित होता है । यह घटना , जिसे बाद में रमन प्रकीर्णन के रूप में जाना गया , रमन प्रभाव से परिणाम देती है । रमन प्रकीर्णन या रमन प्रभाव अणुओं द्वारा किसी फोटोन का अप्रत्यास्थ प्रकीर्णन है जो उच्च कंपन या घूर्णी ऊर्जा स्तरों के लिए उत्तेजित होते हैं।  

जब फोटोन एक परमाणु या अणु से प्रकीर्णित किया जाता है, तो अधिकांश फोटॉन प्रत्यास्थ रूप से प्रकीर्णित हो जाते हैं ( रेले प्रकीर्णन ) और प्रकीर्णित फोटॉनों की ऊर्जा ( आवृत्ति और तरंगदैर्ध्य ) परिणामी फोटॉनों के समान होती है । प्रकीर्णित फोटानों का एक छोटा - सा अंश ( 1 करोड़ में लगभग 10 लाख ) उत्तेजना से प्रकीर्णित हो जाते हैं , साथ ही प्रकीर्णित फोटॉनों की आवृत्ति परिणामी फोटोनों से भिन्न होती है और आमतौर पर परिणामी फोटोनों की तुलना में कम होती है । किसी गैस में, रमन प्रकीर्णन किसी अणु के अन्य ऊर्जा स्तर ( आमतौर पर उच्च ) पर संक्रमण के कारण उसकी ऊर्जा में परिवर्तन के साथ घटित हो सकता है । केमिस्ट्स मुख्यतः संक्रमणकालीन रमन प्रभाव से संबंधित होते हैं । 1954 में भारत ने उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार , भारत रत्न से सम्मानित किया । 

मेघनाद साहा ( 1893-1956 ) ढाका, ( अब बंगलादेश में है ) , में जन्में एक खगोल - भौतिकविद थे । उनकी उत्त समझी गई कृति तत्वों के ऊष्मीय आयनीकरण ( थर्मfल इओनाइजेशन ) से सम्बद्ध है और इसके फलस्वरूप उन्हें साहा इओनाइजेशन इक्वेशन सूत्र तैयार करने में सफलता मिली , जिसका इस्तेमाल तारों की रासायनिक और भौतिक स्थितियों का वर्णन करने के लिए किया जाता है ।

साहा आयनीकरण समीकरण जिसे साहा - लैंगमुझर समीकरण भी कहा जाता है , एक ऐसा व्यंजक है जो किसी तत्व के आयन की स्थिति को तापमान और दवाव से संबद्ध बनाती है । समीकरण क्वांटम यांत्रिकी और सांख्यिकीय यांत्रिकी के विचारों को युग्मित करने का परिणाम है और तारों के वर्णक्रमीय वर्गीकरण को समझाने के लिए उपयोग किया जाता है । 

खगोलभौतिकविद् आमतौर पर एक वाक्यांश यानी " सही ढंग से साहा करें " का उपयोग करते हैं , जिससे पता चलता है कि साहा उन गिने चुने वैज्ञानिकों में से एक हैं , जिनके नाम का इस्तेमाल " क्रिया " के रूप में किया जाता है ।

सत्येंद्र नाथ बोस ( 1894-1974 ) बंगाल के एक सैद्धांतिक भौतिकविज्ञानी थे । उन्हें 1920 के दशक के शुरू में क्वांटम यांत्रिकी पर किए गए उनके कार्य के लिए भली - भांति जाना जाता है , जिसके फलस्वरूप बोस - आइंस्टीन आँकड़ों की नींव रखी गई और बोस - आइंस्टीन घनीभूतता के सिद्धांत को मूर्त रूप दिया गया । 

क्वांटम आँकड़ों में , बोस - आइंस्टीन आँकड़े ( या अधिक बोलचाल में बी - ई आँकड़े ) दो संभावित तरीकों में से एक हैं जिसमें गैर - अन्तर्निहित अप्रभेद्य कणों का संग्रह , उष्मागतिकीय संतुलन पर उपलब्ध असतत ऊर्जा अवस्थाओं के एक समूह का अधिग्रहण कर सकता है । एक ही अवस्था में कणों का एकत्रीकरण , जो बोस - आइस्टीन आँकड़ों का पालन करने वाले कणों की एक विशेषता है , लेसर प्रकाश की संयोजी स्ट्रीमिंग और सुपरफ्लुइड हीलियम के घर्षणरहित घिसटने के लिए उत्तरदायी होता है । 1924-25 में बॉस द्वारा विकसित विचार बाद अपनाया गया और अल्बर्ट आइंस्टीन ने उनके साथ मिलकर से इसे बढ़ाया । 

बी - ई आँकड़े केवल उन कणों पर लागू होते हैं , जो समान अवस्था के एकल अधिग्रहण तक सीमित नहीं हैं . और जो पाउली अपवर्जन सिद्धांत प्रतिबंधों का पालन नहीं करते हैं । ऐसे कणों में चक्रण के पूर्णाक मान होते हैं और उन्हें बोस के नाम पर बोसोन नाम दिया गया है । ब्रह्मांड की उत्पत्ति से संबंधित प्रश्नों का उत्तर देने की अपनी खोज में वैज्ञानिक , विशेषकर फ्रांस - स्विट्जरलैंड सीमा के निकट स्थित लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर ( जो भारत सहित 22 साझीदारों का सीईआरएन केंद्र है ) के वैज्ञानिक एक बोसोन , विशेषकर हिंग के बोसोन की तलाश करते रहे हैं । 2012 में , सीईआरएन ने 'एक नए कण के आविष्कार की घोषणा की , जो हिग्स बोसोन मॉडल के अनुरूप है । 

एक स्व - शिक्षित विद्वान और बहुश्रुत , बोस की रुचि अनेक विषयों में थी । इनमें भौतिकी, गणित, रसायन विज्ञान, जीवविज्ञान, खनिज विज्ञान, दर्शनशास्त्र, कला, साहित्य और संगीत जैसे विषय शामिल थे । रॉयल सोसाइटी के एक फेलो , उन्हें भारत सरकार द्वारा 1954 में भारत के दूसरे सबसे उच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया । 

क्वांटम इंडियंस 2013 में राजा चौधरी द्वारा लिखित और निर्देशित एक वृत्तचित्र है जो 3 भूले - बिसरे भारतीय वैज्ञानिकों , सी.वी. रमन, मेघनाद साहा और सत्येंद्र नाथ बोस, की कहानी बताता है जिन्होंने दुनिया को बोसोनों , रमन प्रभाव और साहा समीकरण एवं बोसोन प्रदान करके 20 वीं सदी के प्रारंभ में भौतिकी और भारतीय विज्ञान में क्रांतिकारी बदलाव किया । 

श्रीनिवास आयंगर रामानुजन ( 1887-1920 ) मद्रास, अब चेन्नई, के गणितज्ञ थे । वे एक ऐसे स्व - अध्येता ( स्व - प्रशिक्षित व्यक्ति ) थे , जिन्होंने शुद्ध गणित में औपचारिक प्रशिक्षण के विना गणित में अनेक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया , जिनमें गणितीय विश्लेषण , संख्या सिद्धांत . अनंत शृंखला और सतत् भिन्न शामिल हैं । रामानुजन ने प्रारंभ में वियोजन में स्वयं का गणितीय अनुसंधान विकसित किया , जिसे शीघ्र ही भारतीय गणितज्ञों द्वारा मान्यता दी गई । जब उनका कौशल स्पष्ट हो गया और व्यापक गणितीय समुदाय के लिए ज्ञात हो गया तो उन्होंने कैम्ब्रिज में अंग्रेज गणित प्रो . जी . एच . हार्डी के साथ साझेदारी शुरू की। 

अपने छोटे जीवनकाल के दौरान , रामानुजन ने स्वतंत्र रूप से करीब 3900 परिणाम संकलित किए , जिनमें अधिकतर समरूपता और समीकरण से संबद्ध थे । उनके लगभग सभी दावे अब सही साबित हुए हैं । उनके मूल और अत्यधिक अपरंपरागत परिणाम . जैसे रामानुजन अभाज्य और रामानुजन ने आगे व्यापक शोध को प्रेरित किया। थोटा फलन, ने आगे व्यापक शोध को प्रेरित किया। विज्ञान चिकित्सा | रामानुजन द्वारा प्रतिपादित गणितीय कार्य को प्रकाशित करने के लिए एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका , रामानुजन जर्नल , शुरू की गई । अत्यंत धार्मिक प्रकृति वाले रामानुजन ने अपनी एक बार कहा था कि " मेरे लिए किसी समीकरण का तब व्यापक गणितीय उपलब्धियों का श्रेय ईश्वर को दिया । उन्होंने तक कोई अर्थ नहीं है , जब तक वह ईश्वर के विचार को व्यक्त न करता हो ।

हार्डी - रामानुजन संख्या 1729 है । हार्डी के अनुसार ' मुझे याद है कि एक बार जब रामानुजन पुटने में बीमार थे , तो उनसे मिलने के लिए जाते समय मैं टैक्सी नंबर 1729 में बैठा था और मैंने टिप्पणी की कि यह संख्या मुझे बेकार सी लगी और मैं उम्मीद करता हूँ कि कोई प्रतिकूल शकुन नहीं होगी । " नहीं " . उन्होंने उत्तर दिया , " यह एक बहुत ही रोचक संख्या है ; यह दो अलग - अलग तरीकों से दो घनों की राशि के रूप में व्यक्त की जाने योग्य सबसे छोटी संख्या है । " दो अलग - अलग तरीके इस प्रकार हैं : 
                
1729 = 1 + 12 = 9 + 10 

इस घटना के ठीक पहले , हार्डी ने यह कहते हुए लिटिलवुड का उद्धरण दिया , " हर धनात्मक पूर्णाक रामानुजन के व्यक्तिगत मित्रों में से एक था " । द मैन हू न्यू इन्फिनिटी 2015 में बनी ब्रिटिश जीवनी नाट्य फिल्म है , जो रॉबर्ट कानिजेल द्वारा 1991 में लिखी गई और उन्हीं के नाम के शीर्षक वाली पुस्तक पर आधारित है । फिल्म अभिनेता देव पटेल ने श्रीनिवास रामानुजन की भूमिका अदा की है , जिसमें रामानुजन का वास्तविक जीवन चित्रित किया गया है , जो मद्रास , भारत में गरीबी में बड़े होने के बाद प्रथम विश्व युद्ध के दौरान कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी गए , जहाँ उन्होंने अपने गणितीय सिद्धांतों को प्रो . जी.एच. हार्डी के मार्गदर्शन के साथ बेहतर किया , जिनका किरदार जेरेमी आयरन्स ने निभाया है । रामानुजन पर एक अन्य पुस्तक " द इंडियन क्लर्क " है , जो डेविड लेविट ने लिखी है ।